Friday, July 13, 2012

विदा के क्षणों में

डर था...
की विदा के क्षणों में उभर जायेगी गाँठें
और रिसने लगेगी मवाद हृदय से
नभ खो देगा ठहराव की क्षमता
और मरीचिकाएँ करेगी , रहस्यमय शोर
चीखते हुए जलेंगे तारा-नक्षत्र

ऐसा कुछ भी तो नहीं हुआ

कल जैसा ही था आज भी
तेरे अहाते में बिखरी छाया का रंग
चकुलों के गीत उतने ही लयबद्ध
और
हृदय शांत था उस निर्जन वन सा
जहाँ से
गुजर चूका हैं बसंत

-अहर्निशसागर -

2 comments:

  1. आह । खूबसूरत.

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  2. हम्म्म्मम्म्म्म, सही तो है

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