Wednesday, February 3, 2016

माँ और पिता




माँ, हर रंग के वस्त्र को
तुरंत सिल सकती थी
उसके पास हर रंग के धागे थे
एक-एक धागा
हम सबकी आत्मा के रंग का भी था।
___

माँ, टूटे बटन टांक देती
और उधड़े कपडे रफू कर देती
प्रेम के गहरे क्षणों में
कई बार उसनें
पिता की आत्मा को भी टांका हैं
लेकिन
पिता कभी जान नहीं पाये
जानेंगे, जब उनकी आत्मा को
टाँकने के लिए माँ नहीं होगी
___

पिता का कुर्ता कई जगह से उधड़ गया था
धागे निकल आये थे
माँ कहती - लाओ सिल देती हूँ
लेकिन पिता मना कर देते
पिता अपने बुढ़ापे में
ठीक वैसा ही दिखना चाहते थे
जैसी माँ की आत्मा थी।
___

सालों से माँ, अपने कपडे
पिता के कपड़ों के साथ धोती रही हैं
पिता के कपड़ों पर
बहुत हल्का माँ के कपड़ों का रंग चढ़ गया हैं
बहुत ध्यान से
कभी उनको देखता हूँ
पिता, अब कुछ-कुछ माँ दिखते हैं।
___

माँ, काम से फारिग होते ही
सिलाई मशीन पर बैठ जाती 
उसके पैर सूर्य की तरह अपनी धुरी पर घूमते 
माँ के पैरों का गुरुत्व हमारी गृहस्थी को बांधे रखता 
हम माँ के नजदीक नक्षत्रों की तरह रहते 
और पिता इस गृहस्थी का दूरस्थ हिस्सा थे
वे रोजगार के लिए देसावर जाते
और महीनों बाद लौटते
किसी धूमकेतु की तरह। 


जो हमारा पुल बनती हैं

















एक स्वप्न में पुल पार करता हूँ
दो कदम आगे चलता हूँ
पुल पीछे दो कदम ढह जाता हैं
पुल पार होते ही, पूरा नदी में ढह जाता हैं
एक उम्र में जब स्त्रियों को देखता हूँ
तो लगता हैं
स्त्रियां कभी बूढी नहीं होती
वे पुल बन जाती हैं
हम उन्हें पार करते हैं और वे समय की नदी में ढह जाती हैं
बच्चे बगीचों में झूलों पर झूलते हैं
सहसा कहीं से पिता की आवाज सुनाई पड़ती हैं
वे दौड़ कर पिता के पास चले जाते हैं
खाली झूला बगीचे के एकांत में झूलता रहता हैं
घर की बुजुर्ग स्त्री
घर के एक कोने में माला जपते हुए आगे-पीछे झूल रही हैं
कहीं से पिता की आवाज आई होगी
कुछ था जो दौड़ता हुआ पिता के पास चला गया
और उस स्त्री की देह संसार के बगीचे में झूलती हुई छूट गई
झूले भी हवा में बना पुल होते हैं
जो नीरवता के दो अज्ञात किनारों को छूते हैं
जब वे ठहर जाते हैं, वे ढह जाते हैं
आखिरी स्त्री जो हमारा पुल बनती हैं
पार करने की उकताहट से भर चूका मैं
उसे पार नहीं करूँगा
उसके साथ ढह जाऊंगा।

Tuesday, August 4, 2015

प्रेम रहा, लेकिन इतना निस्पंद











उपन्यास
एक लंबी कथा होती हैं प्रिय !
लेकिन यह एक वृक्ष की आत्मकथा थी
वहीँ खड़ा
वहीँ बढ़ा
वहीँ ठूंठ हुआ


सिर्फ दो ही मौसम थे
पतझड़, जिसमें बाहर की तरफ झरता
एक बसंत, जिसमें भीतर की तरफ झरता

इतना नीरस जीवन था
कि एक कविता तक की जगह नहीं थीं
प्रेम रहा, लेकिन इतना निस्पंद
कि स्मृतियों में टांगने के लिये
एक गर्म सांस तक नहीं हैं

इतना धीरे....
इतना धीरे करीब आना हुआ
कि हम अंत के बाद ही मिल सके ।

शुक्रिया के बदले शुक्रिया












शुक्रिया के बदले शुक्रिया
शुभकामना के बदले शुभकामना
प्रेम के बदले प्रेम
इससे निश्चित और निजी
मेरे पास कुछ नहीं


और जीवन कितना अनिश्चित !
अमरुद की सबसे कच्ची डाल पर भी
पक्षियों के घोसले हैं,
ऐसी जगहों पर भी घोसले हैं
जो अगले बसंत तक अपनी जगहें पर नहीं बचेगी

लौट आने की भी एक अनिश्चित मियाद हैं
जहाँ से मैंने विदा ली वो जगहें भी अनिश्चित
अचानक मियाद ख़त्म हो जाएं
हम उन जगहों पर लौट नहीं पाएंगे
जहाँ से हमने विदा ली थी

यात्रा के गंतव्य अनिश्चित हैं
लेकिन निश्चित हैं यात्रा
निश्चित हैं..
शुक्रिया के बदले शुक्रिया कहूँगा
प्रेम के बदले प्रेम दूंगा
लेकिन लौट आने का वचन न दूंगा
सादर
सविनय
नमस्कार करूँगा
चल दूंगा

Saturday, January 3, 2015

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इस तरह सुखांत कहानियों का दुखांत होता हैं, कि सुख तब आता हैं जब कहानी खत्म हो जाती हैं।
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यहाँ ऊंची आवाजें सुनी नहीं जाती। इस तरह बुलाओ मेरी जान, जैसे घास बारिशों को बुलाती हैं।
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मैं संसार की गोष्ठियों में नहीं था, संसार में था।
जैसे कुछ लोग कविताओं की गोष्ठियों में नहीं थे, कविताओं में थे।
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पहाड़ के जिन ढलानों पर धूप बहुत कम आती थी। पेड़ धूप पाने की प्रतिस्पर्धा में ऊँचा और ऊँचा उठते जाते थे। लेकिन रेगिस्तान में ऐसा नही था। वहां दिन भर झुलसा देने वाली धूप होती। पेड़ इस तरह तुड़े-मुड़े खड़े रहते जैसे अपनी ही छाया में बैठने की कोशिश कर रहे हो। कुछ पेड़ अपनी डालियाँ एक दूसरे की तरफ बढ़ाते, जैसे दो अलग-अलग पिंजरों में कैद प्रेमी, एक दूसरे का हाथ छूने की कोशिश करते हैं। सालों बात वे रिहा होंगे और एक दूसरे की छायाओं में आ पाएंगे।
पहाड़ के पेड़ इस तरह ऊँचे उठते हैं, लगता हैं वे जमीन से मुक्ति चाहते हैं। रेगिस्तानी पेड़ इस तरह झुके होते हैं, कि लगता है वे आकाश से मुक्ति चाहते हैं। लेकिन रात उन सबके लिए एक जैसी थी, एक ठंडा प्रतीक्षालय, जहां रूककर वे मुक्ति की प्रतीक्षा करते थे।
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कितने सेटेलाइट्स गिद्दों की तरह पृथ्वी का चक्कर काट रहे हैं। चप्पे-चप्पे पर नजर रखे हुए। फिर भी कितनी ऐसी जगहें हैं, जहाँ कोई चला जाएँ तो हम उसे ढूंढ ना पाये। इस शहर में जगह-जगह गुमशुदा लोगो के इश्तहार लगे हैं। गुमशुदा लोगो की भीड़ सफर करती हैं, गुमशुदा स्टेशनों से चढ़ती हैं, गुमशुदा स्टेशनों पर उतर जाती हैं। गुमशुदा लोग गुमशुदा लोगो के इश्तहार पढ़ते हैं। कई बार उन इश्तहारों को करीब जाकर गौर से देखते हैं और कहते हैं 'हाँ मिल गया, यह मैं हूँ'। यह पूरी भीड़ गुमशुदा लोगो की भीड़ हैं। जिनके गुमशुदा होने के इश्तहार नहीं लगे, उन्हें ढूंढने वाले भी गुमशुदा हैं। एक गुमशुदा ग्रह ब्रह्माण्ड में लगातार लुढ़कता रहता हैं। एक गुमशुदा प्रजाति उसपर बसर करती हैं।
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कुछ लोग काफ़्का का पिंजरा नही होते जिन्हें पंछी की तलाश होती हैं।
वे एकांत में गिरा एक चाकू होते हैं। चाकू एक तलवार की तरह सीधे-सीधे हथियार नहीं हैं, लेकिन वह एक हथियार हो सकता हैं। चाकू अधिक
रहस्यमय और जटिल चीज़ हैं। वह किसी कामगार के हाथ में भी हो सकता और कातिल के भी, वह दुर्गम यात्राओं के यात्री के पास भी हो सकता हैं। वे लोग एकांत में पड़े चाकू की तरह इंतजार करते हैं उन रहस्यमय हाथों का जो उसके हत्थे को थामेंगे।
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प्रेम करने के लिए जरूरी हैं एथलीट होना। स्वप्न और यथार्थ के बीच एक पलायन का चौड़ा दर्रा होता हैं, जिसे कूद कर पार करना होता हैं।
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पहाड़ पर चढ़ने का सुख किसी चिड़ियाँ को नही मिल सकता। वह उनके लिए आरक्षित हैं जिनके पास पंख नहीं हैं।
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एक नदी थी । नदी के समानांतर नदी के जल की गति से बैलगाड़ियाँ चलती थी। पूर्वज जिस गति से सफ़र करते थे वह इतनी धीमी थी की एक गाँव से दुसरे गाँव, एक शहर से दुसरे शहर, एक दुःख से दुसरे दुःख तक पहुँचने में वक्त लगता था। कभीकभार यह वक्त इतना लम्बा होता था कि एक ही दुःख को भोगते-भोगते पूर्वज दम तोड़ देते थे। लेकिन मैं सौभाग्यशाली हूँ , अभी मैं एक बस पकडूँगा और नदी की रफ्तार से कई गुना तेज़ गाँव के दुःख को पीछे छोड़ शहर के दुःख में प्रवेश कर जाऊँगा।

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कोई भला कैसे इतनी समग्रता से चला जा सकता हैं कि दृश्य की स्मृति तक शेष न रहें। वह गुजरेगा तो समय के भीतर से गुजरेगा, और समय एक चिपचिपी चीज़ हैं।
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चमत्कार किस लिए प्रभु ? मैं तो एक फुल देखकर भी चौंक जाता हूँ।
सोचता हूँ, इस क्रूरता से भरी हुई पृथ्वी पर ऐसा कैसे हो सकता हैं।
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एक बार कि बात हैं कि हर बार "एक बार" एक बार होकर ऊब चूका था अब वह दूसरा, तीसरा होना चाहता था।
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सुख अपने चरम पर घुटन बन जाता हैं, दुःख अपने चरम पर दुःख नहीं रहता, यातना अपने चरम पर पीड़ा नहीं दे पाती। अगर किसी अपराध की ग्लानि वश तुम मृत्यु के लिए तैयार खड़े हो जाओ, फिर कोई ग्लानि नहीं बचती। अंततः सब कुछ ख़त्म हो जाता हैं। हमारे बाद कुछ देर तक हमारी अनुपस्थिति रहेगी, धीरे-धीरे वह भी ख़त्म हो जायेगी।
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पत्नी कई बार फोन पर पूछती हैं - क्या कर रहे हो ? मैं अगर रोटी नहीं भी पका रहा होता, फिर भी कह देता हूँ 'रोटी पका रहा हूँ'। वह रोटी के पकने का अर्थ मुझसे बेहतर जानती हैं। कि अगर रोटी पक रही हैं मतलब सूरज में गर्मी हैं, कि धरती हैं, धरती पर फसल हैं, और यह संसार सकुशल हैं।
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मैं कभी सत्य की तलाश में रहा नहीं। मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी अगर तुम लगातार झूठ बोलती रहो।
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विज्ञानं ईश्वर को नहीं मानता, लेकिन कैसा विरोधाभास हैं वह मनुष्य को ईश्वर बनाना चाहता हैं।
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मैं जो लिखता हूँ वह इसलिए कि तुम जान सको मुझे क्या नापसंद हैं ।और मेरी पसंद जानने के लिए तो तुम्हें अपने भीतर ही एक यात्रा पर निकलना होगा, की आखिर वह क्या था जिसके खातिर मैं तुम्हारे पास जीवन-भर ठहरा रहा।
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मिलने का सुख विछोह के दुःख से अधिक रुलाता हैं। मिलते वक्त कैसा कौतुक होता हैं आँखों में, जैसे समाधी से अभी-अभी जागा हुआ ऋषि संसार को देख रहा हैं।
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धीरे-धीरे जीवन के कीड़े उसकी देह को रेशम में बदल देंगे, और आत्मा शहतूत के तने कि तरह सख्त और शुष्क हो जायेगी। यह मेरे लिए तुम्हारे भीतर कैसी पीड़ा हैं ? कि इस पीड़ा के अंत में तुम्हारी देह मेरे लिए वस्त्र बनेगी और आत्मा बनेगी जलावन।
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बिल्ली भूख से बचने के लिए चूहे पर झपटती हैं, चूहा बिल्ली से बचने के लिए झपटता हैं बिल की तरफ। इस घर में सालों से शिकार और शिकारी दोनों बचाव कि मुद्रा में हैं।
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मेरे पूर्वज एक ख़ानाबदोश टोली का हिस्सा थे। बरसो पहले हम उस टोली से छिटक कर उजाड़ मरुभूमि में बस गए। यह छिटकन सिर्फ भौगोलिक स्तर पर नहीं घटी, यह पलायन हमारे चेहरों, हमारी बोली, यहाँ तक कि प्रेम के गहरे पलों में हमारी आत्मा तक पर नजर आता था। मेरे परिवार के पास जो यह वर्तमान हैं वह अतीत कि स्मृतियों का अपभ्रंश हैं। मैं जब भी पिता से इस पलायन का कारण पूछता, उनका चेहरा डर और रहस्य के मिश्रण से काला पड जाता। एक अरसे से पिता और परिवार से दूर, मैं इस शहर में हूँ अब जाकर कुछ-कुछ समझ आता हैं कि पिता क्यूँ "वक्त" को "वखत" बोला करते थे। हमारा समय हमारी स्मृतियों का अपभ्रंश था।
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वह स्त्री, स्त्रीत्व से इतनी भरी हुई थी कि जब-जब मैं कनेर कि शाख कि तरह उसकी ओंर झुकता, मेरी शिखा के सारे फूल आहुति कि तरह उसके पैरों में गिर जाते।
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नए कमरे को घर समझ लेने कि भूल कर बैठना एक समाजवादी इच्छा हैं। तस्वीर के लिए दीवार में कील ठोक रहा था तभी मालकिन ने फटकार दिया, यह शुद्ध पूंजीवादी प्रताड़ना हुई। कैसे-कैसे विचार आते हैं किराये के कमरे में। जैसे पिंजरा मुर्गे को कुत्तों से बचाता हैं कसाई से नहीं। चटक पीले रंग कि दीवारे हैं इस कमरे कि ठीक वैसा ही पीला जैसा वानगॉग को पसंद था और इस कदर पसंद था कि उसने आत्महत्या के लिए सूरजमुखी का खेत चुना। अगर जो उसके पास सूरजमुखी के खेत न होते तो वह निसंदेह मेरा कमरा चुनता। रात के अँधेरे में विचित्र आकृतियां उभरती हैं इन दीवारों पर। "डाली" इन्हीं आकृतियों का मारा था। पिकासो यहीं से प्रेरणा पाता था। शाम होती हैं तो संसार में जितना सुख हैं पतीले में उतने चावल रखता हूँ। दुःख जितना पानी मिलाता हूँ। इस तरह किराये के कमरे में गृहस्थी के चूल्हे पर चावल पकता हैं। संघर्ष जितना आटा गूंथता हूँ तो तीन टक का गुजर हो जाता हैं। आटा भी अजीब चीज़ हैं उसीके प्रेम में होता हैं जो उसे मचलता हैं, हाथों पर बार-बार सरसों का तेल मलने पर भी हथेलियों में चिपक जाता हैं। सोते वक्त सोचता हूँ कितने पात्र हैं इस कमरे में और कितनी घटनाएं लेकिन इस दुनियां का कोई अख़बार नही निकलता। बीच-बीच में सिरहाने रखा फोन झनझनाता हैं तो लगता हैं कमरा ढह रहा हैं।
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क़त्ल करने की त्वरा, क़त्ल से बचने की त्वरा से तीव्र नही हो सकती दुनियां की हर भाषा में "शेष रह गया" के लिए एक शब्द हैं।
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जीवन अराजकता में गुजरा तो मृत्यु शांति की तरह आई। हम पृथ्वी की कक्षा में साइकिलों पर सवार बेहद साधारण लोग थे। हमारे जीवन में बड़े-बड़े गजद्वार नहीं थे सिर्फ छोटे-छोटे सुराख़ थे, हमें जीने को उतना ही जीवन मिल पाया जितना तुम्हारे जी लेने के बाद सुराखों के इस तरफ ढुल पाया। पृथ्वी पर बसे शहरों में हम चूहों की तरह थे। डर, दुर्गन्ध और वितृष्णा से भरे हुए। इस सम्मोहन को तोड़ने के लिए की हम सचमुच चूहे नहीं हैं, जोर जोर से साइकिलों की घंटियाँ बजाते हुए शहरों को पार करते थे। और अपने बिलों में दुबक जाते। हमें अपने गाँवों की याद आती थी, अगर हम शहरों में चूहों की तरह थे तो गाँवों में बिल्लियों की तरह थे। बिल्लियों के अलावा हम अभिजात्य पशु घोडा या हाथी भी तो हो सकते थे, लेकिन घोडा या हाथी होना हमारे मोक्ष का हिस्सा नहीं था। एक चूहा अपना मोक्ष हमेशा बिल्ली होने में तलाशता रहा।
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थार के पेड़ों में अधिक करुणा होती हैं । हो सकता हैं वह धरती के भीतर पानी के संघर्ष से पैदा हुई हो। जब थार में किसी एक पेड़ की पत्तियां झर जाती है तो पड़ोस का पेड़ भी अपनी पत्तियां झरा देता हैं । और इस तरह पड़ोस दर पड़ोस पत्तियां झरती जाती हैं । एक पेड़ का दुःख इतने हिस्सों में बाँट लिया जाता हैं की एक पेड़ का पतझड़ सामूहिक दुःख बन जाता हैं, और "दुःख" पतझड़ का उत्सव।

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-अहर्निशसागर-

तुम रचना














तुम रचना,
अंत के बाद आग रचना
और जीवन के लिए घड़े में पानी रच देना
घर पहुंचकर, घर से कुछ बाहर रह जाऊं 
अंजुरी में भरकर, घर ले आना
मुझे घर में पूरा रचना
हर मूर्त-अमूर्त चीज़ का नेपथ्य हैं
पहले उनका नेपथ्य रचना
मेरा पास आना रचने से पहले
मेरा चले जाना रच देना
खड़ी चारपाई आँगन में लिटा दो
तो चारपाई रच जाती हैं
चलते-चलते थक कर सो जाऊँगा
सोते-सोते थक जाऊं, तो अंत रच देना
लेकिन अंत के तुरंत बाद आग मत रचना
बीच में स्मृतियाँ रचना
अगर हो सकें तो कुछ भी महान रचने से बचना
महान को बार-बार रचा नहीं जा सकता
जहां महान बार-बार रचा जा सकें
ऐसी 'जगहें' रचना।
-अहर्निशसागर-

Monday, November 24, 2014

जन्म के लिए

वह एक गर्म जेठ की दुपहर थी
अहाते में एक चिड़ियाँ बार-बार 
पानी से भरे टब में कभी अपना सिर डुबाती
कभी पंख कभी पूछ और शरीर को झटक देती
तभी घर में मेरे जन्म के उल्लास का शोर हुआ
वह चिड़ियाँ चौंक कर उड़ गई 

अपने जन्म के लिए 
मैं उस चिड़ियाँ से क्षमा मांगता हूँ ।

-अहर्निशसागर-

लौटना

एक दिन हम सब लौट आते हैं 
लेकिन लौटने का दिन इतने दिनों बाद आता हैं 
कि हम अपने ही घर का दरवाजा खटखटाते हैं
और बार-बार पूछते हैं -
क्या कोई हैं ?
क्या कोई अंदर हैं ?

-अहर्निशसागर-

हारूँगा












हारूँगा
लेकिन एक योद्धा की तरह नहीं
असल में एक योद्धा की अंतिम हार ही
उसकी विजय होती 
जिस तरह विजेता हार और हार विजेता पैदा करती है 
जिस तरह युद्ध हथियार और फिर हथियार युद्ध पैदा करते हैं
ऐसे किसी सिलसिले के क्रम में नहीं हारूँगा 

बेटी पिता की तरफ दोनों हाथ बढ़ाती हैं
दोनों हाथों में लकड़ी की दो फिरकियाँ हैं
'पप्पा, ये आपकी...और ये मेरी '
अगर मेरी फिरकी पहले घूमना बंद हुई
वह पंजे के बल आँगन में ख़ुशी से उछल पड़ेगी

किसी शासक या शोषक से नहीं
एक बच्चे से हारूँगा

अचानक फिरकी की तरह
एक तरफ लुढ़क जाऊँगा ।


-अहर्निशसागर-

जरूर मृत्यु एक गिलहरी होगी















अगर कुछ भी हैं
जिसे अमरत्व प्राप्त हैं
तो जरूर मृत्यु एक गिलहरी होगी
जो चीज़ों को आधा-अधूरा कुतर कर छोड़ देती हैं
जीवन चाहे कितना ही असाधारण रहा हो 
मृत्यु साधारण होनी चाहिए
विस्लाव शिम्बोर्स्का के टिड्डे की तरह
मसलन, झुण्ड उड़ गया
और हम एक कांटे में बिंधे रह गए
मैं हाँक लगाकर खेतों से तोते उड़ाया करता था
कभी एक साथ इतने तोते डरकर उड़ जाते
कि भ्रम हो जाता,
लगता तोते बैठे रह गए और खेत उड़ गया
ऐसे ही किसी भ्रम की आड़ में उड़ जाना चाहता हूँ
जैसे तुझसे सट कर मैं बैठा रह गया
.....और देह उड़ गई
मैं किराये के कमरे बदलता रहता हूँ
शहर में भी और संसार में भी
देह के भी और अ-देह के भी
पिछली बार जब नए कमरे में रहने आया
कमरे में मेज पर एक गुलदान पड़ा था
उसमें कई बार फूल बदले गए थे
एक दिन अंतिम बार बदले गए
फिर कभी नहीं बदले गए

-अहर्निशसागर-

Friday, June 6, 2014

अगर यह पृथ्वी बच्चों को सौंप दी जाएँ












अगर यह पृथ्वी बच्चों को सौंप दी जाएँ
वे अमूमन हर चीज को खिलौने में बदल देंगे

ज्वर से तपता हुआ बच्चा पिता से दवा नहीं
खिलौने मांगता हैं
पिता उसके हाथ में रंगीन कपडे की
झूठमुठ की चिड़ियाँ देते हैं
और पुचकार कर मुंह में दवा का ढक्कन उड़ेल देते हैं
तन्मयता और धन्यता से भरे हुए
साहस और डर का मिश्रण
इन्हें कभी हत्या के लिए नहीं उकसाता

एक स्त्री पृथ्वी के नीरव कोने में
जब अकेली खड़ी सुबक रही होगी
एक बच्चा उसके पैरों से लिपटा हुआ होगा

कोई युद्ध जब राष्ट्र को एकजुट कर रहा होगा
उस एकजुट होते राष्ट्र में बच्चे इस तरह बिखर जायेंगे की फिर कभी नहीं मिलेंगे
वे गुपचुप एक रंगीन कपडे की चिड़िया की आड़ में
इस तरह बड़े हो रहें होंगे
जैसे लुप्त हो रहे हैं ।


-अहर्निशसागर- 

अंतिम सुख में












अंतिम सुख में
कितनी पीड़ा होती हैं !
नदी में घुटनों तक उतर कर
तुम्हें अंतिम बार चूमता हूँ
और डोंगी को अनंत कि ओंर धकेल देता हूँ

इस घाटी में बसे गाँव के चारो ओंर
कितनी पहाड़ियां हैं और उनके शिखर हैं
लेकिन मैं उन्हें फतह नहीं करूँगा
चढूंगा और उस पार उतर जाऊँगा
उस पार भी गाँव हैं गड़रिये हैं और घास हैं

अनंत कि तरफ जा चुके लोग कहीं भी मिल सकते हैं,
हर गाँव में, गड़रियों में, घास में
कहीं भी मिल सकते हैं, मसलन
एक डोंगी रेत पर तैरती हुई भी मेरी तरफ आ सकती हैं

पहली सांस लेते हुए
कितनी पीड़ा होती हैं नवजात को
अंतिम निःश्वास में राहत होगी
जो अंतिम दुःख होगा
सुख कि तरह होगा ।


-अहर्निशसागर- 

Monday, February 10, 2014

बसंत















यह ऋतु बंद होते फाटकों
खिड़िकियों कि आवाज से भरी हुई हैं
शिशिर के इस आँगन में
एक बच्ची गड़लिये से चलना सिख रही हैं
कितना विस्मय हैं
पृथ्वी पर शिशिर और बसंत आता हैं
अनंत निर्वात में यह छोटा सा स्पंदन

बच्ची गड़लिये को धकेलती हैं
तो पहिये चियां-चियां कि आवाज करते है
यह आवाज छत्तों में शहद भरेगी
कबूतर फड़फड़ाते हुए बावड़ियों से बाहर आयेंगे
यह आवाज पार करेगी
तमाम बंद फाटकों और खिड़कियों को
आच्छादित होगी पूरी पृथ्वी इसी आवाज से

एक बार फिर
शिशिर के इस आँगन में बसंत आएगा
चियां-चियां करते हुए।


-अहर्निशसागर-

माँ के लिए














स्मृतियों में
माँ हमेशा खाली घड़ा लिए हुए
पंचायत भवन के नलके कि तरफ जाती हुई दिखाई देती हैं
माँ खाली घड़ा लिए हुए जीवनभर मीलों चली हैं
इस तरह उसने सूखी गृहस्थी को नम रखा हैं
उसके चलने कि कुल गिनती करूँ तो
सूर्य के चारो तरफ पृथ्वी कि कक्षा से अधिक दूरी बैठेगी

अगर माँ आगे-आगे चलने को तैयार हो
मैं पीछे-पीछे घड़ा लिए दूर-दिगंत तक जा सकता हूँ
सारे समंदरों को आँगन के हौज में खाली कर सकता हूँ
फिर भी मेरी जांघों में जो ख़म हैं
वह उस सामर्थ्य का आधा भी नही हैं
जिस मजबूती से माँ घड़े जितने वजनी गर्भ में मुझे लिए
पृथ्वी के खिंचाव के विरुद्ध पुरे नौ महीने तक संसार में खड़ी रही

कद-काठी से माँ कुछ बटकी थी
जब वह चिता पर लेटी, कुल नौ डग में ही
मैंने घड़ा लिए चिता कि परिक्रमा पूरी कर ली
माँ को मृत्यु के घर कि चौहद्दी तक छोड़ आया
लेकिन मृत्यु के घर भी माँ खाली कहाँ बैठी होगी
अज्ञात आयामों में खाली घड़ा लिए निकल गई होगी

देर-सबेर जीवन कि चौहद्दी को लाँघ कर
मैं भी मृत्यु के घर में प्रवेश करूँगा
वहाँ माँ तो शायद नही मिलेगी
लेकिन हो सकता हैं
जीवन जी चुकने के बाद लगी प्यास को
तर करने के लिए
पळींडे में रखा पानी से भरा एक घड़ा मिले।


-अहर्निशसागर

Thursday, December 19, 2013

प्रेम जीवन की देह हैं















प्रेम जीवन की देह हैं
और देह प्रेम हैं जीवन का

ये कहना-
की मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
या नहीं करता
दोनों अब एक-सा अर्थ रखते हैं

दक्षिणी गोलार्ध पर जाकर
समाप्त हो जाती है दक्षिण दिशा
अब मैं जिस ओर जाऊं
निसंदेह वह "उत्तर" होगा ।

-अहर्निशसागर- 

भविष्य लौटता हैं मेरी तरफ














भविष्य लौटता हैं मेरी तरफ
रण भूमि से लंगड़ाते हुए उस घोड़े की तरह
जिसकी पीठ पर सेनापति की लाश हैं

वृतमान के कौनसे वार नें घोड़े को घायल किया ?
अतीत की कौनसी गलती से सेनापति मारा गया ?
मैं नहीं जानता

कायर राजा की तरह
बार-बार शराब गटकता हूँ
और झरोखे से झांकता हूँ
सोचता हूँ
भविष्य चाहे एक हो लेकिन
मेरे पास घायल होने के लिये असंख्य घोड़े हो
मारे जाने के लिए असंख्य सेनापति ।

-अहर्निशसागर -

धैर्य / समर्पण / आज्ञा














धैर्य
------------
तो सवाल धैर्य कितना ?
सुखी घास में शिकार कि ताक में दबे हुए
तेंदुए जितना धैर्य
अर्थात छलांग के साहस जितना धैर्य

मृत्यु कि सरहद पर देर-सबेर एक फूल खिलेगा
उसके खिलने के इन्तजार जितना धैर्य
और खिलते ही छलांग जितना अधैर्य ।


समर्पण
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वृक्ष कि तरह अरण्य को अंगीकार कर लेना
हरीतिमा के केंद्र से पत्ते कि तरह किनारों को
पीला होते देखना
और पतझड़ के प्रथम प्रहर में ही झड़ जाना

चाहे जीवन भरा हो
सुख से लबालब
प्यासा गला मिले तो सहसा उलीच देना।


आज्ञा
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जीवन कभी रंगरूट कि तरह
एड़िया पटक कर सलामी नहीं देता
जीवन अराजक होता हैं
सिर्फ़ कारतूस के समानांतर चलती
मृत्यु अनुशासित हो सकती हैं

आज्ञा देने से पहले
मुझ पर गोली दाग दो।

-अहर्निशसागर-

Tuesday, October 22, 2013

कहता हूँ "विदा"











चित्रकार स्याह करता जा रहा हैं अपने रंगों को 
लगता हैं दुनियां तेज़ रौशनी से भर चुकी हैं 
विदा की यात्रा अब शुरू होती हैं 
विदा ! 

जैसे बच्चे सेंध लगाते हैं संतरों के बगीचे में 
मैंने सेंध लगाई वर्जित शब्दों के लिए 
सभ्यता के पवित्र मंदिर में 

संतरे के पेड़ों की जड़ें पृथ्वी के गर्भ तक जाती थी 
और पृथ्वी की जड़ें जाती हैं सूरज के गर्भ तक
और अगर सूरज दीखता रहा संतरे जैसा
तो मैं निश्चिंत हूँ, बच्चे उसे सेंध लगा के बचा लेंगे

चींटियों के हवाले करता हूँ
पृथ्वी को, मेरे 
बच्चों को, समूचे जीवन को
चींटियाँ काफी वजन उठा लेती हैं
अपने वजन से भी ज्यादा
तो मैं निश्चिंत हूँ,
प्रलय से ठीक पहले
चींटियाँ सुरक्षित खींच ले जायेगी पृथ्वी को

बेहद कमजोर पर भरोसा करके
कहता हूँ "विदा"


-अहर्निशसागर-

Thursday, July 11, 2013

यथार्थ












यथार्थ के पास "यथार्थ" की कोई कल्पना नहीं होती
सारी कल्पनाएँ "कल्पनाओं" की कल्पनाएँ हैं
अगर तुम सचमुच समंदर से प्रेम करती हो
तो एक मछली बन जाओ !


-अहर्निशसागर-

रहस्य














रहस्य "रहस्य" बना हुआ हैं
और हम सब अपने सच्चे अर्थों में झूठे हैं
ठीक ईश्वर की तरह !


-अहर्निशसागर-